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सरल राजयोग

स्वामी विवेकानन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :73
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9599

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स्वामी विवेकानन्दजी के योग-साधन पर कुछ छोटे छोटे भाषण

सरल राजयोग

प्रस्तावना

संसार के अन्य विज्ञानों की भांति राजयोग भी एक विज्ञान है। यह विज्ञान मन का विश्लेषण तथा अतीन्द्रिय जगत् के तथ्यों का संकलन करता है और इस प्रकार आध्यात्मिक जगत् का निर्माण करता है। संसार के सभी महान् उपदेष्टाओं ने कहा है, ''हमने सत्य देखा और जाना है।'' ईसा, पॉल और पीटर सभी ने जिन सत्यों की शिक्षा दी, उनका प्रत्यक्ष साक्षात्कार करने का दावा किया है।

यह प्रत्यक्ष अनुभव योग द्वारा प्राप्त होता है।

हमारे अस्तित्व की सीमा केवल चेतना अथवा स्मृति नहीं हो सकती। एक अतिचेतन भूमिका भी है। इस अवस्था में और सुषुप्ति में संवेदनाएँ नहीं प्राप्त होती। किन्तु इन दोनों के बीच ज्ञान और अज्ञान जैसा आकाश-पाताल का भेद है। यह आलोच्य योगशास्त्र ठीक विज्ञान के ही समान तर्कसंगत है। मन की एकाग्रता ही समस्त ज्ञान का उद्गम है।

योग हमें जड़-तत्त्व को अपना दास बनाने की शिक्षा देता है, और उसको हमारा दास होना ही चाहिए। योग का अर्थ जोड़ना है अर्थात् जीवात्मा को परमात्मा के साथ जोड़ना, मिलाना।

मन चेतना में और उसके नीचे के स्तर में कार्य करता है। हम लोग जिसे चेतना कहते हैं, वह हमारे स्वरूप की अनन्त शृंखला की एक कड़ी मात्र है। 

हमारा यह 'अहम्’ किंचित् मात्र चेतना और विपुल अचेतना को घेरे रहता है, जब कि उसके परे, और उसकी प्राय: अज्ञात, अतिचेतन की भूमिका है।

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